Tea HISTORY चाय के बारे में

 
आजकल सुबह की शुरुआत एक कप चाय के बिना अधूरी-सी लगती है। सच बात तो यह है कि बिना चाय के अख़बार पढ़ने में भी मज़ा नहीं आता है। थकान भरे दिन के बाद हमें जिस चीज सबसे ज्यादा जरुरत महसूस होती हैं वो है - एक कप चाय ! आप कही भी जाइए - ढाबे से लेकर बड़े से बड़े होटलों तक हर जगह चाय मौजूद होती है और ज्यादातर  लोग पहली फरमाइश चाय की ही करते है।  कोई भी समारोह हो चाय के बिना पूरा नहीं हो सकता। चीन में इसे 'वेलकम  ड्रिंक ' माना जाता है तो जापान जैसे विकसित देश में अतिथियों के स्वागत के लिए ' टी सेरेमनी 'की जाती है। वास्तव में मनुष्य का चाय से प्रथम परिचय इसके स्फूर्तिदायक गुणों के कारण ही हुआ था।  


चाय का इतिहास


देश के विभिन्न क्षेत्रो के विभिन्न जलवायु के कारण  चाय के किस्मो के गुणों में अंतर होता है।दक्षिण  भारत के नीलगिरि के पठारी के क्षेत्रो  में और उतर पूर्व में  दार्जिलिंग और असम में चाय की खेती होती है।

 ऐसा  माना जाता है कि एक चीनी भिक्षु ने अपनी तपस्या के दौरान थकावट महसूस होने पर जब गर्म  पानी पिया तो उसे अचानक स्फूर्ति का एहसास हुआ। बाद में उसने देखा कि जिस बर्तन में पानी गर्म हो रहा था , उसमे पास ही में लगे पेड़ की गिरी हुई थी और यह पेड़ चाय का था।     




 छठी शताब्दी में चाय पीने की परम्परा जापान पहुंची। एक बौद्ध भिक्षु इसे चीन से जापान ले गया। इसके बाद चाय जापान में शाही दरबार और बौद्ध मठो से लेकर पुरे जापानी समाज में तेजी से फैल गया। धीरे -धीरे इसकी खबर यूरोप तक पहुंची। चीन से चाय का व्यापार करने का पहला अधिकार पुर्तगाल को मिला। इंग्लैंड में चाय के नमूने 1652 और 1654 में पहुंचे।  एशिया महाद्वीप में चाय का आगमन 19 वी शताब्दी में हुआ था  जब ब्रिटिश शासक ने सीलोन और ताइवान में चाय  खेती शुरू  की। 

भारत चाय का ना केवल सबसे बड़ा उत्पादक देश है,बल्कि भारत चाय का सबसे बड़ा निर्यातक देश भी है ,यही कारन है की भारत की अर्थव्यवथा  में चाय का महत्वपूर्ण स्थान है। भारत  के अलावा चीन जापान ,अफ्रीका ,श्रीलंका और रूस भी चाय उत्पादक देश है।  भारत में विभिन्न क्षेत्रो चाय की अनेक किस्मो की बड़े पैंमाने पर खेती होती है।


दक्षिण  भारत के नीलगिरि के पठारी के क्षेत्रो के चाय की गुड़वत्ता  श्रीलंका के चायो जैसी होती है वहीं असम और दार्जलिंग की चाय की गुड़वत्ता दुनिया में श्रेष्ठ होती है। 

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